दरअसल, जमीन के नीचे भुरभुरी बालू ने विशेषज्ञों के समक्ष चुनौती खड़ी कर दी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बालू की परत के चलते पाइल टेस्टिंग के दौरान बनाए गए पिलर 2 से 3 इंच खिसक गए थे। जिसके बाद राममंदिर के नींव के नक्शे को लेकर मंथन जारी है। बताया जा रहा है कि मंदिर की मजबूती के लिए विशेषज्ञ जिस तरह से डैम (बांध) की दीवार बनती है उस विधि का इस्तेमाल नींव के निर्माण में कर सकते हैं जिससे कि मंदिर लंबे समय तक सुरक्षित बना रहे। निर्माण में इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि अगर भविष्य में सरयू नदी अपना रास्ता बदलती है तो भी इसका असर मंदिर की नींव पर न पड़े। दरअसल, शोध में पाया गया कि सरयू नदी अब तक पांच बार अपनी दिशा बदल चुकी है।

बुनियाद में मिल रही बालू

सरयू नदी के किनारे होने के कारण बुनियाद में मिल रही बालू के कारण मंदिर की मजबूती को लेकर सवाल पैदा हो रहे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए 1200 स्तंभों का निर्माण किया जाना है। इसके पहले टेस्टिंग के लिए 12 पिलर का निर्माण किया गया है, लेकिन टेस्टिंग के दौरान जब इस पर भार डाला गया तो कुछ पिलर जमीन के निचले हिस्से में खिसक गए।


सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, 15 दिसंबर को दिल्ली में हुई बैठक में यह तय हुआ है कि अब नए सिरे से राममंदिर की नींव की डिजाइन तैयार की जाएगी। इसके लिए आठ सदस्यीय कमेटी भी गठित की गई है। बताया गया कि एक हफ्ते पहले अयोध्या में हुई मंदिर निर्माण समिति की बैठक में मंदिर स्थल के 200 फीट नीचे मिली बालू की लेयर को लेकर मुद्दा उठा था। राम मंदिर की नींव की सतह पीली मिट्टी की न होकर रेत की मिली है। ऐसे में पाइलिंग टेस्ट और लोड टेस्ट के बाद काफी रिसर्च करनी पड़ रही है।

कमेटी की रिपोर्ट पर ही नए सिरे से नींव की शुरुआत होगी

आईआईटी दिल्ली के पूर्व निदेशक वीएस राजू की अध्यक्षता में गठित 8 टॉप इंजीनियर और कंस्ट्रक्शन एक्सपर्ट मंदिर की नींव से जुड़े कामों पर नजर बनाए हुए हैं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सूत्रों के अनुसार इंजीनियर की कमेटी की रिपोर्ट पर ही नए सिरे से नींव की शुरुआत होगी। एक्सपर्ट की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाएगी। यह रिपोर्ट मंदिर निर्माण समिति और ट्रस्ट के बीच रहेगी।

नींव में इस्तेमाल किए जा सकते हैं भारी पत्थर
मंदिर स्थल के नीचे मिली बालू को देखते हुए कहा जा रहा है कि मंदिर नींव में भारी पत्थरों का इस्तेमाल हो सकता है। जो सैकड़ों वर्ष तक सुरक्षित रहते हैं और जमीन के नीचे रहने पर भी उनका क्षरण नहीं होता है।

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